गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

कब तलक सोये रहोगे,सोने से क्या हासिल हुआ

कब तलक सोये रहोगे,सोने से क्या हासिल हुआ,
व्यर्थ अपने वक्त को खोने से क्या हासिल हुआ,,
शान और शौकत हमारी जो कमाई ''वीरों'' ने वो जा रही,
अब सिर्फ बैठे रहने से क्या हासिल हुआ,,
सोती हुई राजपूती कौम को जगाना अब पड़ेगा,
गिर ना जाए गर्त में, ''वीरों'' उठाना अब पड़ेगा,,
बेड़ियाँ ''रुढिवादिता'' की पड़ी हुई जो कौम में,
उन सभी बेड़ियों को तोडना हमें अब पड़ेगा,,
संतान हो तुम उन ''वीरों'' की वीरता है जिनकी पहचान,
तेज से दमकता मुख और चमकती तलवार है उनका निशान,,
वीरता की श्रेणी में ''क्षत्रियों'' का पहला है नाम,
झुटला नहीं सकता जमाना, इथिहस है साक्षी प्रमाण,,
प्रहार कर सके ना कोई अपनी आन-बाण-शान पर,
जाग जाओ अब ऐ ''वीरो'' अपने ''महाराणा'' के आवहान पर,,
शिक्षा और संस्कारों की अलख जागते अब चलो,
राह से भटके ''वीरों'' को संग मिलते अब चलो,,
फूट पड़ने ना पाए अपनी कौम में अब कभी,
''क्षत्रिय एकता'' ऐसी करो के मिसाल दें हमारी सभी,,
कोई कर सके ना कौम का अपनी उपहास,
आओ ''एक'' होकर रचें हम अपना स्वर्णिम इतिहास,
जय महाराणा-एक होकर बुलंद करो राजपुताना....!!

दारूरा दुरगण

पिण्ड झड़े, रोबा पड़े, पड़िया सड़े पेंशाब।
जीब अड़े पग लडथड़े, साजन छोड़ शराब (१)
कॉण रहे नह कायदो, आण रहे नह आब।
(जे) राण बाण नित रेवणो,(तो) साथी छोड शराब (२)
जमीं साख जाति रहे, ख्याति हुवे खराब।
मुख न्याति रा मोड़ले, साथी छोड़ शराब (३)
परणी निरखे पीवने, दॉत आंगली दाब।
भॉत भॉत मांख्यां भमे, साजन छोड़ शराब (४)
आमद सू करणो इधक, खरचो घणो खराब ।
सदपुरखॉ री सीखहे, साथी छोड़ शराब (५)
सरदा घटे शरीर री, करे न गुरदा काम।
परदा हट जावे परा, आसव छोड़ अलाम (६)
कहे सन्त अर ग्रंथ सब, निष्चय धरम निचोड़ ।
जे सुख चावे जीवणो, (तो) छाक पीवणो छोड़ (७)
मोनो अरजी रे मनां, मत कर झोड़ झकाळ।
छाक पीवणी छोड़दे, बोतल रो मुॅहबाळ (८)
चंवरी जद कंवरी चढी, खूब बणाया ख्वाब ।
ख्वाब मिळगया खाक मे, पीपी छाक शराब (९)
घर मोंही तोटो घणों, रांधण मिळे न राब।
बिलखे टाबर बापड़ा, साजन छोड़ शराब (१0)
दारू में दुरगण घणा , लेसमात्र नह लाब ।
जग में परतख जोयलो , साथी छोड़ शराब (११)

अपने पूर्वजों का सम्मान करें

१- अपने पूर्वजों का सम्मान करें तथा अपने बच्चों को पूर्वजों की कथाओं/गुणों से परिचित कराएँ.
२- अपने-अपने घरों में महाभारत,गीता,रामायण एवं महापुरुषों से सम्बंधित गाथाएं आदि ग्रंथों को अवश्य रखें तथा बच्चों को कभी-कभी उसका पाठ करने के लिए प्रेरित करें तथा उसे आप भी सुनें. क्षत्रिय महापुरुषों का चित्र भी अपने घरों के दीवालों पर लगायें.
३- अपने बच्चों का नामकरण भी पूर्वजों के नाम के अनुरूप रखें तथा नाम के साथ अपनी क्षत्रियता की पहचान के लिए कुलों की उपाधियों को रखना न भूलें, क्योंकि यथानाम तथागुण चरितार्थ होती है. बच्चों में इससे क्षत्रियोचित गुणों का विकास होता है.
४- नाम भी ऐसा रखें जिससे बच्चे अपने आपको गौरवान्वित महसूस करें. नैतिक शिक्षा एवं अनुशासन का भी पाठ पढ़ायें तथा अपने बच्चों को आज्ञाकारी बनायें.
५-अपने वचन का पालन करें. आदर्श आचरण स्थापित करें तथा अच्छे आचरण के लिए बच्चों के साथ-साथ दूसरों को भी प्रेरित करें.
६- बच्चों को मर्यादा का उल्लंघन नहीं करने की शिक्षा दें तथा बड़ों का आदर करना सिखाएं.
७. बच्चों को पढने के साथ-साथ खेलने की भी पूरी आज़ादी दें तथा शारीरिक गठन के लिए व्यायाम खेलकूद के लिए भी प्रोत्साहित करें.
८- लड़कियों की शिक्षा में भी कोई कमी या कोताही नहीं बरतें तथा उन्हें हर तरह की शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करें.
९- अगर संभव हो तो दहेज़ रहित शादी करें/कराएँ तथा आदर्श विवाह को प्रोत्साहित करें. शादी-विवाह सादगीपूर्ण तरीके से करें तथा अनावश्यक खर्चों से बचने का प्रयास करें. साधनविहीन एवं आर्थिक रूप से पिछड़े भाई बंधुओं को शादी विवाह आदि में यथासंभव सहयोग करें. सामूहिक शादी का आयोजन कर
फिजूलखर्ची से बच सकते हैं. यदि गाँव में एक ही समाज में कई घरों में शादियाँ हो तो सामूहिक पंडाल बनाकर और सामूहिक भोज का आयोजन कर फिजूलखर्ची पर रोक लगाया जा सकता है.
१०-क्षत्रिय/राजपूत कहने में गौरव का अनुभव करें. स्कूल/कॉलेज/घर/मकान/दुकान/मोहल्ला/मार्ग/संस्था/प्रतिष्ठान आदि का नामकरण भी अपने महापुरुषों के नाम पर करें या राजपूत से सम्बंधित कोई पहचान के नाम पर रखें ताकि क्षत्रियता/राजपूत होने का बोध हो.
११. संकोच या भय का सर्वथा परित्याग करें. साहस का परिचय दें. साहसी एवं दृढ निश्चयी बनें.
१२- पौराणिक परम्पराओं एवं मान्यताओं तथा कुल की मर्यादाओं का सख्ती से पालन करें/कराएँ.
१३- राजपूत जाति के लड़के या लड़कियों का विवाह राजपूत समाज में ही होना श्रयस्कर हो सकता है. अंतरजातीय विवाह संबंधों को कतई प्रोत्साहन नहीं दें. क्योंकि इसके गंभीर परिणाम भविष्य में सामने आते हैं.
१४- इतिहास प्रसिद्द महापुरुषों की जयंतियां सामूहिक रूप से मनाई जाय तथा उनके आदर्शों पर चलने का बार-बार संकल्प करें.
१५- जातीय जीवन को प्रेरणा देने वाले त्योहारों में सबसे महत्वपूर्ण है विजयादशमी का त्यौहार. क्षत्रियों/राजपूतों के लिए इस पर्व से बढ़कर कोई त्यौहार नहीं है. अतएव इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ सामूहिक रूप से मनाएं. इस अवसर पर शस्त्रास्त्र प्रदर्शन एवं सञ्चालन,प्रतिस्पर्धा, घुडदौड़, आखेट, सामूहिक खेल, सामूहिक भोज आदि का कार्यक्रम चलाये जा सकते हैं.
१६- शस्त्रास्त्र निश्चित तौर पर प्रत्येक घरों में अवश्य रखा जाय एवं उसका प्रदर्शन समय-समय पर अवश्य करते रहें ताकि आपका मनोबल हमेशा बना रहे.
१७- शादी-विवाह, सभा-सम्मेलनों, सामूहिक त्योहारों में अपने पारम्परिक वेश-भूषा को अवश्य धारण करें. हमारी पारम्परिक वेश-भूषा पगड़ी,शेरवानी, धोती, कुर्ता और तलवार रहा है. अतः शादी-विवाह के अवसरों पर वर पक्ष एवं वधु पक्ष दोनों पारम्परिक वेश-भूषा का इस्तेमाल करें.
१८- सरकारी सेवा में, सेना में, या पुलिस में नौकरी करने वाले अनुशासन, ईमानदारी, कार्यदक्षता और सच्चरित्रता में अपने उच्चाधिकारियों एवं अपने सहयोगियों के सामने आदर्श प्रस्तुत करें, ताकि आपकी श्रेष्टता सब जगह सिद्ध हो सके. सबों को यह आभास हो कि आप सभी स्थानों पर महान क्षत्रिय/राजपूत चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. ऐसा कोई कार्य नहीं करें, जिससे उनकी महान परम्परा, स्थापित मर्यादा व जाति पर कलंक का धब्बा लगे तथा क्षत्रिय/राजपूत जाति बदनाम हो.
१९- नौकरी के अतिरिक्त व्यवसाय में भी ईमानदारी से धर्मपूर्वक धनार्जन करें. ठगने या धोखाघड़ी से धनार्जन का ख्याल मन में भी कभी न लायें.
२०- दलित वर्ग या श्रमजीवी वर्ग, दीन असहाय और पथ विचलित वर्ग की रक्षा कर न्याय और सच्चाई की रक्षा करना क्षात्र-धर्म का मूल सिद्धांत एवं कर्तव्य है, इसका अनुपालन करें.
२१-हमे इस बात का हमेशा ध्यान में रखना है कि क्षत्रिय/राजपूत एक विकसित जाति और कॉम है. हम सभी जातियों में श्रेष्ठ हैं, इसे कदापि नहीं भूलना चाहिए. आपके आचार-विचार से हमारा पूर्ण समाज, प्रदेश एवं राष्ट्र प्रभावित होता है. हिन्दू संस्कृति में जो भी नियम कायदे स्थापित हैं वह
क्षत्रियों/राजपूतों द्वारा स्थापित हैं इसलिए इसका उल्लंघन अपने निर्मित नियमों से ही विचलित होना है. अतएव इसका पालन करना और कराना हमारा पुनीत कर्त्तव्य है, हमारा दायित्व बनता है।

"छँद-रैँणकी""

माण काज मरणौ मँडै,जँग हद जुङै जवान
रजवट रीत रुखाळणा रँग रे राजस्थान!!1!!
कटै वीर धर कारणै प्रण सट्टै दै प्राण
ऐङा नर उपनै अठै रँग रै राजस्थान!!2!!
नर नैकी चूकै नही बौलण एकी बाण
दैखी इण दुनियाँण मेँ रँग रे राजस्थान!!3!!
मरण परण समभाव मन कोई न राखै;
काण दाखै जस सारी दुनी,रँग रे राजस्थान !!4!!
""छँद-रैँणकी""
मानैय इक रीत परण मरण मन उवा धरण है देख इया  मरिया पग रोप राङ बिच माणस,जीवट उर मेँ राख जिया शौभा इण भाँत साँभळी सुरपत ऐरावत चढ जात अयो सुरधर अन्नै अन्नै मरुधर सत जग पर समवङ रुप जयौ!!1!!
पैखो इम वीर धीर प्रण पाळण,सत पख चाढण नीर सदा ऊनी हद खीर दहै कर उणमेँ जुङै भीर न
होय जुदा भाँजण सौ भीङ अबळ पख भिङिया पीङ
निजू नह सोच पयौ सुरधर अन्नै अन्नैव मरुधर सत जग पर समवङ रुप जयौ!!2!!
शरणागत सटै शीश दे सूरा फिर पाछा नही वचन फुरै
धर पर अमर नाम रा धाका घण डाका जस जाप घुरै 
लाखाँ मुख निडर कीरति लाटण दाटण अरियण प्राण
दयौ सुरधर अन्नै अन्नै मरुधर सत जग पर समवङ रुप जयौ!!3!!
🧞‍♂️🧚‍♀️👅🧠

जय क्षात्र धर्म जय राजपुताना

१- ईला न दैणी आपणी, रण खैता भिड़ जायै !
    पूत सिखावै पालणै,मरण बड़ाई माय!!
अर्थात्
राजपूत माता अपनै पुत्र कौ पालनै ही मे मरने की शिक्षा दैती हुई कहती है कि तू रणक्षैत्र मै शत्रु से भीड़ जाना, किन्तु अपनै दैश कि धरती कौ न दैना!!
वही बालक थौडा बड़ा हौनै पर अपनी माता सै कहता है कि
२-माता बालक क्यु कहौ , रौई न माग्यौ ग्रास!
   जौ खग मारू साह सिर,तौ कहीयौ साबास
अर्थात्
  माता! तू मुझै बालक क्यु कहती है? मैनै कभी भी रोकर ग्रास नही मागां! यदि बादशाह कै सीर पर तलवार मारू, तौ शाबास कहना
यही वीर रण क्षैत्र मै अपनी माता कै स्वपन कौ साकार करता है
३-रणकर कर रज रज रगैं,रिवढकै रज हुतं!
   रद जैती धर नही दियै,रज रद व्है रजपूत ।
अर्थात्
रण की रज कौ रक्त सै लाल करकै भी वह वीर एक कण जितनी जमी भी अपनै जिवित रहतै नही दैता।
रण मे जातै समय उसकी वीर पत्नी सचैत कर दैती है
४- पाछा कर मत झाकज्यौ! पग मत दिज्यौ टार
    कट भल जाज्यौ,खैत मे, पण मत आज्यौ हार।
अर्थात्
पतिदैव आप रण मै कटकर मर जाना पर हार कर मत आना।
और वौ वीर क्षत्राणी कहती है कि
५-बिन मरीया ,बीन जितीया, धणी आविया धाम!
   पग पग चुडी पाछटू, जै रावतरी जाम।
अर्थात्
पतिदैव आप बिना मरै या बिना जितै घर आयै तौ मै आपकै कदम कदम पर चुडीया तौड दुगी , और अगर मै ऐसा ना करू, तौ मै असल राजपूत की बेटी नही
और जब वह वीर रण मे शहीद हौ जाता है तब वह वीर क्षत्राणी कहती है
६-भड़ बिण माथै जितियौ, लीलौ धर ल्यायौहा
   सिर भुलयौ भौलौ घणौ, सासुरौ जायौहा
अर्थात्
मैरी सासु का बैटा कितना भौला है जौ अपना सिर रण मे ही भुल कर आ गया
और क्या बखान करै उन वीरागंनाऔ का जौ स्वय् भी तलवार सै रण मे जौहर करती है
७-गौठ गिया सब गैहरा ,बणी अचानक आय!
   सिहंणा जाई सिहंणी, लीधी तैग उठाय।
अर्थात
घर कै सभी मर्द प्रतिभौज मे बाहर गयै है और इसी  बीच युध्द कि स्थिती आ गयी ! फिर कया था? सिंहौ कौ जन्म दैने वाली सिंहाणी(क्षत्राणी)नै तलवार उठा ली।
सत् सत् नमन है वीरांगना क्षत्राणियों।
जय क्षात्र धर्म
जय राजपुताना

वे बेडु री पड़ेरिया कठै...

वे बेडु री पड़ेरिया कठै...
जीणरे माथे घड़ा धरता..
वे घरा री पोलो कठै..
जीणमेँ दाता सा बिराजता..
वे भीत री खुँटिया कठै...
जीणमेँ माणी कृपाण टंगती.
वे पुराणा खाड़ा कठै...
जे दाता ऊ पोता तक चालता
वो रोटी रो हवाद कठै...
जा.. चुला आगे बैन खाता..
वो गाँव रो प्रेम कठैँ...
जो एक दूजा रे काम आवता....
बखत गयो वस्या मनक गय़ा
मिलता न ढ़ुढ़ता वस्या...
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कुँवर लहरसिंह देवड़ा

बखत पलटों मारेला

बखत पलटों मारेला
राजतंत्र फाजों आवेंला
घणों हों गयों अधर्म 
अबैं धर्म आवेंला
घणों हों गयों अंधारों 
अबैं उजाळों वेवेंला
बखत पलटों मारेला
राजतंत्र फाजों आवेंला 
कोई महाराणा कोई शिवा
कोई दुर्गादास बनेला
मती करजों होच मनखा
पग पग खाड़ो खड़केला
चहुँ ओंर ललकार होवेंला
रजपूत री जयकार होवेंला
बखत पलटों मारेला
फाजों राजतंत्र आवेंला 
जय राजपूताणों
ये रजपूती लेंणा आपरे
हिवड़ा नें भावीं वेवें 
तों इण्नें वना काट्या 
आपणा मनखा रे लारें 
मेंलजोल करावों सा 

लहरसिंह देवड़ा चौंहान